किसान शिकायत निवारण बोर्ड' का गठन
किसान को अपनी शिकायत देने के लिए अलग-अलग दफ्तरों में न भटकना पड़े। बोर्ड का अपना एक सरल टोल-फ्री नंबर और मोबाइल ऐप होना चाहिए, जहाँ किसान घर बैठे अपने फोन से या नजदीकी सीएससी (CSC) केंद्र से सीधे अपनी शिकायत और खेत के फोटो दर्ज करा सके।
बोर्ड में शिकायत दर्ज होने के बाद अधिकतम 30 कार्यदिवस के भीतर उस पर अंतिम सुनवाई और फैसला आना अनिवार्य होना चाहिए। यदि बीमा कंपनी या संबंधित विभाग तय समय में अपनी रिपोर्ट पेश नहीं करता, तो बोर्ड को किसान के पक्ष में एकतरफा फैसला सुनाने का पूरा कानूनी अधिकार होना चाहिए।
जिला स्तर पर स्वतंत्र 'किसान शिकायत निवारण बोर्ड' होना चाहिए: हर जिले में एक ऐसे बोर्ड का गठन होना चाहिए जिसका नेतृत्व जिला जज या एक स्वतंत्र प्रशासनिक अधिकारी करे, और उसमें स्थानीय किसान यूनियनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए। किसान को अपनी किसी भी समस्या (जैसे—क्लेम न मिलना, गलत गिरदावरी, खाद-बीज की कालाबाजारी, या बिजली विभाग की प्रताड़ना) के लिए कोर्ट न जाना पड़े, इसी बोर्ड में सीधा समाधान मिले।
कंपनियां प्रीमियम तो समय पर काट लेती हैं, लेकिन जब नुकसान की भरपाई की बात आती है, तो तरह-तरह के तकनीकी नियम और कागजी कमियां बताकर किसान के क्लेम को खारिज कर दिया जाता है। एक साधारण किसान इन बड़ी-बड़ी कंपनियों और अफ़सरों के सामने बिल्कुल बेबस हो जाता है और उसे न्याय देने वाला धरातल पर कोई नहीं होता।
दोषी अधिकारियों और कंपनियों पर भारी हर्जाना (Penalty) लगे: यदि यह साबित होता है कि किसी बीमा कंपनी ने जानबूझकर या पटवारी की गलत रिपोर्ट के कारण किसान का जायज क्लेम रोका है, तो बोर्ड को यह अधिकार होना चाहिए कि वह कंपनी पर क्लेम राशि का दोगुना जुर्माना लगाए, जिसका एक हिस्सा सीधे पीड़ित किसान को मानसिक प्रताड़ना के मुआवजे के रूप में मिले
गरीब और बीपीएल किसानों का फसल बीमा पूरी तरह मुफ्त हो, प्रीमियम का बोझ सरकार उठाए"
बोर्ड में शिकायत दर्ज होने के बाद अधिकतम 30 कार्यदिवस के भीतर उस पर अंतिम सुनवाई और फैसला आना अनिवार्य होना चाहिए। यदि बीमा कंपनी या संबंधित विभाग तय समय में अपनी रिपोर्ट पेश नहीं करता, तो बोर्ड को किसान के पक्ष में एकतरफा फैसला सुनाने का पूरा कानूनी अधिकार होना चाहिए।
जिला स्तर पर स्वतंत्र 'किसान शिकायत निवारण बोर्ड' होना चाहिए: हर जिले में एक ऐसे बोर्ड का गठन होना चाहिए जिसका नेतृत्व जिला जज या एक स्वतंत्र प्रशासनिक अधिकारी करे, और उसमें स्थानीय किसान यूनियनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए। किसान को अपनी किसी भी समस्या (जैसे—क्लेम न मिलना, गलत गिरदावरी, खाद-बीज की कालाबाजारी, या बिजली विभाग की प्रताड़ना) के लिए कोर्ट न जाना पड़े, इसी बोर्ड में सीधा समाधान मिले।
कंपनियां प्रीमियम तो समय पर काट लेती हैं, लेकिन जब नुकसान की भरपाई की बात आती है, तो तरह-तरह के तकनीकी नियम और कागजी कमियां बताकर किसान के क्लेम को खारिज कर दिया जाता है। एक साधारण किसान इन बड़ी-बड़ी कंपनियों और अफ़सरों के सामने बिल्कुल बेबस हो जाता है और उसे न्याय देने वाला धरातल पर कोई नहीं होता।
दोषी अधिकारियों और कंपनियों पर भारी हर्जाना (Penalty) लगे: यदि यह साबित होता है कि किसी बीमा कंपनी ने जानबूझकर या पटवारी की गलत रिपोर्ट के कारण किसान का जायज क्लेम रोका है, तो बोर्ड को यह अधिकार होना चाहिए कि वह कंपनी पर क्लेम राशि का दोगुना जुर्माना लगाए, जिसका एक हिस्सा सीधे पीड़ित किसान को मानसिक प्रताड़ना के मुआवजे के रूप में मिले
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Sharwan Kumar
Cockroach Legend · 2785 pts
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