सेवा का अधिकार कानून (Right to Service) का कड़ाई से पालन
कागज़ों में तो 'सेवा का अधिकार कानून' बना हुआ है, जिसके तहत जाति प्रमाण पत्र, बिजली कनेक्शन, पानी का नया मीटर, ड्राइविंग लाइसेंस या रजिस्ट्री जैसे सैकड़ों काम तय दिनों में करने का नियम है। लेकिन धरातल पर हकीकत यह है कि इस कानून का कोई खौफ अफ़सरशाही में नहीं है। अफ़सर और बाबू जानते हैं कि अगर उन्होंने काम हफ्तों लटकाए रखा, तब भी उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। आज का आम आदमी इस कानून के होते हुए भी दफ्तरों की चौखट पर अपनी चप्पलें घिसने को मजबूर है।
इस ढर्रे को पूरी तरह बदलना होगा। हमारी सरकार इस कानून को महज़ कागज़ी दस्तावेज़ नहीं रहने देगी, बल्कि इसे हर विभाग के लिए एक सख्त और अनिवार्य हथियार बनाएगी।
इस कानून को धरातल पर प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित कड़े प्रावधान होने चाहिए और हम इन्हें सुनिश्चित करेंगे:
कानून का उल्लंघन करने पर अफ़सरों पर सीधी कार्रवाई: यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी बिना किसी ठोस और लिखित कानूनी कारण के 'राइट टू सर्विस' के तहत तय समय-सीमा (जैसे 7 या 15 दिन) का उल्लंघन करता है, तो इसे सीधे तौर पर 'सेवा नियमावली का उल्लंघन' माना जाना चाहिए। ऐसे अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच और उनकी सर्विस बुक (Service Record) में लाल स्याही से प्रविष्टि होनी ही चाहिए।
स्वतंत्र थर्ड-पार्टी डिजिटल ऑडिट (Third-Party Audit): किस विभाग में कितनी अर्जियां आईं, कितनी समय पर पूरी हुईं और कितनी पेंडिंग हैं, इसकी निगरानी खुद वह विभाग नहीं करेगा। इसके लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष आईटी विंग (Independent Monitoring Cell) होना चाहिए, जो सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) को रिपोर्ट करे, ताकि स्थानीय अधिकारी डेटा में हेरफेर न कर सकें।
'जनता का फीडबैक' ही अफ़सरों का रिपोर्ट कार्ड: किसी भी नागरिक का काम पूरा होने के बाद, उसके पास एक ऑटोमैटिक फीडबैक कॉल या मैसेज जाना चाहिए। यदि नागरिक ने अपनी रेटिंग में 'असंतोषजनक' या 'रिश्वत की मांग' दर्ज की, तो उस दफ्तर के प्रमुख की जवाबदेही तुरंत तय होनी चाहिए।
भ्रष्टाचार पर अंतिम प्रहार: जब आम जनता का काम बिना सिफारिश और बिना दफ्तरों के चक्कर काटे कानून के डर से तय समय में होने लगेगा, तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश अपने आप खत्म हो जाएगी।
इस ढर्रे को पूरी तरह बदलना होगा। हमारी सरकार इस कानून को महज़ कागज़ी दस्तावेज़ नहीं रहने देगी, बल्कि इसे हर विभाग के लिए एक सख्त और अनिवार्य हथियार बनाएगी।
इस कानून को धरातल पर प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित कड़े प्रावधान होने चाहिए और हम इन्हें सुनिश्चित करेंगे:
कानून का उल्लंघन करने पर अफ़सरों पर सीधी कार्रवाई: यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी बिना किसी ठोस और लिखित कानूनी कारण के 'राइट टू सर्विस' के तहत तय समय-सीमा (जैसे 7 या 15 दिन) का उल्लंघन करता है, तो इसे सीधे तौर पर 'सेवा नियमावली का उल्लंघन' माना जाना चाहिए। ऐसे अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच और उनकी सर्विस बुक (Service Record) में लाल स्याही से प्रविष्टि होनी ही चाहिए।
स्वतंत्र थर्ड-पार्टी डिजिटल ऑडिट (Third-Party Audit): किस विभाग में कितनी अर्जियां आईं, कितनी समय पर पूरी हुईं और कितनी पेंडिंग हैं, इसकी निगरानी खुद वह विभाग नहीं करेगा। इसके लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष आईटी विंग (Independent Monitoring Cell) होना चाहिए, जो सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) को रिपोर्ट करे, ताकि स्थानीय अधिकारी डेटा में हेरफेर न कर सकें।
'जनता का फीडबैक' ही अफ़सरों का रिपोर्ट कार्ड: किसी भी नागरिक का काम पूरा होने के बाद, उसके पास एक ऑटोमैटिक फीडबैक कॉल या मैसेज जाना चाहिए। यदि नागरिक ने अपनी रेटिंग में 'असंतोषजनक' या 'रिश्वत की मांग' दर्ज की, तो उस दफ्तर के प्रमुख की जवाबदेही तुरंत तय होनी चाहिए।
भ्रष्टाचार पर अंतिम प्रहार: जब आम जनता का काम बिना सिफारिश और बिना दफ्तरों के चक्कर काटे कानून के डर से तय समय में होने लगेगा, तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश अपने आप खत्म हो जाएगी।
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Sharwan Kumar
Cockroach Legend · 2785 pts
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