मध्य प्रदेश में बढ़ते रेप केस: क्या सिस्टम बेटियों की सुरक्षा में विफल हो चुका है?
मध्य प्रदेश में बढ़ते रेप केस: क्या सिस्टम बेटियों की सुरक्षा में विफल हो चुका है?\nमध्य प्रदेश लंबे समय से महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ अपराधों को लेकर देशभर में चिंता का विषय बना हुआ है। पिछले दो वर्षों में राज्य में सामने आए रेप, गैंगरेप और नाबालिग बच्चियों से दुष्कर्म के मामलों ने केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल नहीं खड़े किए, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली को कठघरे में ला दिया है। सरकार लगातार सुरक्षा के दावे करती रही, लेकिन जमीनी हकीकत उन दावों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है।\nहर घटना के बाद प्रशासन की ओर से वही तयशुदा बयान सामने आता है — “आरोपियों को बख्शा नहीं जाएगा”, “कड़ी कार्रवाई होगी”, “फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला चलेगा”। लेकिन सवाल यह है कि अगर व्यवस्था इतनी मजबूत है, तो आखिर अपराध रुक क्यों नहीं रहे? क्यों हर कुछ दिनों में किसी मासूम बच्ची, छात्रा या महिला के साथ दरिंदगी की खबर सामने आती है?\nसबसे बड़ी विफलता पुलिस व्यवस्था की दिखाई देती है। कई मामलों में पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया कि थानों में शिकायत दर्ज करने में टालमटोल की गई, दबाव बनाया गया या समझौते के लिए कहा गया। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाओं को न्याय पाने के लिए सामाजिक अपमान और प्रशासनिक उदासीनता दोनों का सामना करना पड़ता है। कई पीड़िताएं डर और शर्म के कारण सामने ही नहीं आ पातीं, क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं होता कि सिस्टम उन्हें सुरक्षा देगा।\nदूसरी बड़ी समस्या न्याय प्रक्रिया की धीमी रफ्तार है। सरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट की बात तो करती है, लेकिन हजारों मामले वर्षों तक लंबित पड़े रहते हैं। पीड़िता और उसका परिवार तारीख पर तारीख झेलता रहता है, जबकि आरोपी कई बार राजनीतिक संरक्षण या कमजोर जांच का फायदा उठाकर बच निकलते हैं। जब अपराधी को सजा जल्दी नहीं मिलती, तो समाज में कानून का डर भी खत्म होने लगता है।\nराजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी एक गंभीर मुद्दा है। जब कोई बड़ा मामला मीडिया में आता है, तब सरकार सक्रिय दिखाई देती है, लेकिन कुछ दिनों बाद वही मामला फाइलों में दब जाता है। अपराध रोकने के लिए जमीनी स्तर पर पुलिस बल की कमी, महिला सुरक्षा तंत्र की कमजोर स्थिति, स्कूल-कॉलेजों में सुरक्षा व्यवस्था का अभाव और ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी जैसी समस्याओं पर गंभीर काम नहीं हो पाता।\nसिस्टम की एक और बड़ी कमजोरी है — महिलाओं की सुरक्षा को केवल “घटना के बाद” देखने की मानसिकता। अपराध रोकने के लिए सामाजिक शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, युवाओं में संवेदनशीलता और डिजिटल अश्लीलता पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर गंभीर पहल की जरूरत है। लेकिन सरकारें अधिकतर घटनाओं के बाद मुआवजा और बयानबाजी तक सीमित रह जाती हैं।\nग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्थिति और अधिक चिंताजनक है। कई मामलों में पीड़ित परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और प्रभावशाली लोगों के खिलाफ लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं रहते। ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन पर निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यदि न्याय केवल ताकतवर लोगों के हिसाब से चलेगा, तो आम जनता का भरोसा व्यवस्था से खत्म होना स्वाभाविक है।\nसोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर महिला सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं, लेकिन धरातल पर महिलाओं की सुरक्षा अब भी एक अधूरा वादा बनी हुई है। केवल पोस्टर, अभियान और हेल्पलाइन नंबर पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत है पुलिस सुधार, त्वरित न्याय, संवेदनशील प्रशासन और राजनीतिक जवाबदेही की।\nमध्य प्रदेश की जनता अब यह पूछ रही है कि आखिर बेटियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? हर घटना के बाद मोमबत्तियां जलती हैं, विरोध प्रदर्शन होते हैं, लेकिन अगर सिस्टम की सोच और कार्यशैली नहीं बदलेगी, तो ऐसी घटनाएं केवल आंकड़ों में बदलती रहेंगी।\nमहिलाओं की सुरक्षा किसी भी सभ्य समाज की पहचान होती है। यदि एक राज्य अपनी बेटियों को सुरक्षित माहौल नहीं दे पा रहा, तो यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक और सामाजिक तंत्र की असफलता है। अब समय केवल बयान देने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को जमीनी स्तर पर बदलने का है।
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Sonu Prajapati
Cockroach Scout · 200 pts
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